ईरान: शान्तिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर दमनात्मक कार्रवाई, स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय जाँच की मांग |

मानवाधिकार विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मनमाने ढंग से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिये जाने, गिरफ़्तारियों, लिंग-आधारित व यौन हिंसा, अत्यधिक बल प्रयोग, यातना व लोगों को जबरन ग़ायब कर दिये जाने के आरोप सामने आए हैं.

विशेष रैपोर्टेयर ने बुधवार को जारी अपने साझा वक्तव्य में इन आरोपों की विस्तृत व स्वतंत्र रूप से जाँच कराए जाने और दोषियों की जवाबदेही निर्धारित किये जाने का आग्रह किया है.

महसा अमीनी को ईरान की तथाकथित नैतिकता पुलिस ने 13 सितम्बर को गिरफ़्तार किया था. ख़बरों के अनुसार उन्हें हिरासत में लेते समय बुरी तरह मारा-पीटा गया था, जिसका ईरानी अधिकारियों ने खंडन किया है.

महसा अमीनी एक बन्दी केन्द्र में कथित तौर पर बेहोश हो गई थीं और शुक्रवार, 16 सितम्बर को अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई.

ईरानी अधिकारियों का दावा है कि महसा अमीनी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई.

इसके बाद से ही देश में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन भड़क उठे. प्रदर्शनकारी महिलाओं व लड़कियों के दमन पर विराम लगाए जाने और उनके बुनियादी अधिकार सुनिश्चित किये जाने की मांग कर रहे हैं.

विशेषज्ञों ने कहा कि ईरानी सुरक्षा बलों द्वारा निहत्थे शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर जानबूझकर व ग़ैरक़ानूनी ढंग से बारूद, धातु की गोलियों व अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया जाना, वैधानिकता, सतर्कता, आवश्यकता ग़ैर-भेदभाव और आनुपातिकता के सिद्धांतों का उल्लंघन है.

उन्होंने आगाह किया कि हिरासत में लिये गए और कार्रवाई में मारे गए प्रदर्शनकारियों की संख्या “चिन्ताजनक स्तर पर पहुँच रही है, जिनमें अनेक बच्चे, महिलाएँ व बुज़ुर्ग हैं.

“सरकार को पुलिस को आदेश देना होगा कि किसी भी प्रकार से आवश्यकता से अधिक जानलेवा बल प्रयोग को रोका जाए और संयम का परिचय दिया जाए.”

लिंग आधारित हिंसा पर चिन्ता

विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध शारीरिक व यौन हिंसा, और हिरासत में रखे जाने के दौरान उनके अधिकारों को नकारा जाना, भयावह है.

उन्होंने बताया कि मानवाधिकार हनन के ये मामले लम्बे समय से जारी लिंग-आधारित भेदभाव के जारी रहने को दर्शाते हैं, जोकि क़ानूनों, नीतियों, और सामाजिक ढाँचों में रची बसी है.

उन्होंने कहा कि पिछले चार दशकों में देश में महिलाओं व लड़कियों के लिये बर्बादी का कारण रही है.

विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत के बाद से ही इंटरनेट समेत संचार व्यवस्था में अवरोध आया है और देश में कथित मानवाधिकार हनन के मामलों पर जानकारी की सुलभता प्रभावित हुई है.

परिजनों से पूछताछ

बताया गया है कि प्रदर्शनकारियों के परिजनों को डराए-धमकाए जाने व उनका उत्पीड़न किये जाने के मामले सामने आए हैं.

इन रिपोर्टों के अनुसार पारिवारिक सदस्यों से ग़ैरक़ानूनी ढंग से पूछताछ की जा रही है, और कथित रूप से ऐसी झूठी सूचनाएँ जुटाने की कोशिश हो रही है, जिससे किसी व्यक्ति की मौत होने की ज़िम्मेदारी ‘दंगाइयों’ या ईरान के तथाकथित शत्रुओं के लिये काम कर रहे लोगों पर डाली जा सके.

स्वतंत्र विशेषज्ञों ने ईरान से आग्रह किया है कि अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत तय दायित्वों का निर्वहन किया जाना होगा, और आरोपों की निष्पक्ष, स्वतंत्र व कारगर जाँच तत्काल व पारदर्शी ढंग से कराई जानी होगी.

उनका मानना है कि महसा अमीनी की मौत के बाद से ही, जो जाँच आगे बढ़ी है, वो स्वतंत्रता व निष्पक्षता की न्यूनतम अहर्ताओं को पूरा नहीं करती है.    

“यह पहली बार नहीं है जब ईरान में महिलाओं व लड़कियों ने भेदभावपूर्ण क़ानूनी व तौर-तरीक़ों को हटाने की मांग की है, और फिर उन्हें डराए-धमकाए जाने, दमन व हिंसा का सामना करना पड़ा है.”

अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का अनुपालन

“हम ईरान सरकार से प्रासंगिक मानवाधिकार क़ानूनों पर मुहर लगाने और राष्ट्रीय क़ानूनों को उनके अनुरूप बनाए जाने का आग्रह करते हैं, जिनका ईरान अभी सम्बद्ध पक्ष नहीं है.

विशेष रैपोर्टेयर ने हालात की गम्भीरता के मद्देनज़र, मानवाधिकार परिषद से आग्रह किया है कि हालात से निपटने के लिये तत्काल ज़रूरी कार्रवाई की जानी होगी, जिसके तहत एक विशेष सत्र भी आयोजित किया जा सकता है.

साथ ही, एक अन्तरराष्ट्रीय जाँच तंत्र भी स्थापित किया जाना होगा, ताकि ईरान में जवाबहेदी सुनिश्चित की जा सके और मानवाधिकार हनन के गम्भीर मामलों में व्याप्त दंडमुक्ति की भावना का अन्त किया जा सके.

मानवाधिकार विशेषज्ञ

विशेष रैपोर्टेयर और स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ, संयुक्त राष्ट्र की विशेष मानवाधिकार प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं.

उनकी नियुक्ति जिनीवा स्थिति यूएन मानवाधिकार परिषद, किसी ख़ास मानवाधिकार मुद्दे या किसी देश की स्थिति की जाँच करके रिपोर्ट सौंपने के लिये करती है.

ये पद मानद होते हैं और मानवाधिकार विशेषज्ञों को उनके इस कामकाज के लिये, संयुक्त राष्ट्र से कोई वेतन नहीं मिलता है.

इस वक्तव्य पर दस्तख़त करने वाले मानवाधिकार विशेषज्ञों के नाम यहाँ देखे जा सकते हैं. 

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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