डिजिटल आतंकवाद से लड़ाई के लिये, यूएन सुरक्षा परिषद ने जताया मज़बूत सकंल्प |

यह बैठक 28 अक्टूबर को मुम्बई और 29 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित की गई.

‘दिल्ली घोषणापत्र’ (Delhi Declaration) नामक यह दस्तावेज़, आतंकवादी उद्देश्यों के लिये नई व उभरती टैक्नॉलॉजी के प्रयोग पर लगाम कसने पर केंद्रित है, और क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है.

बैठक के दौरान सिलसिलेवार ढँग से इस चुनौती के अनेक पहलुओं पर चर्चा हुई, जिसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, यूएन अधिकारियों, नागरिक समाज संस्थाओं, निजी सैक्टर और शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया.

इस घोषणापत्र में ड्रोन व सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म के ग़लत इस्तेमाल, और ऑनलाइन माध्यमों पर आतंकियों द्वारा धन जुटाने से उपजी मुख्य चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है.

साथ ही, उन दिशानिर्देशों को तैयार किये जाने की योजना है, जिनसे इस बढ़ती चुनौती का सामना करने में मदद मिलेगी.

आतंकवाद निरोधक कार्यकारी समिति शाखा के प्रमुख डेविड स्खारिया ने बताया कि ‘दिल्ली घोषणापत्र’ ने आगे बढ़ने के लिये एक नींव को तैयार किया है.

“इसमें मुख्यत: मानवाधिकारों, सार्वजनिक-निजी साझेदारी, नागरिक समाज के साथ सम्पर्क व बातचीत का उल्लेख किया गया है, और यह भी कि हम इस चुनौती का सामना करने के लिये किस तरह एक साथ मिलकर काम करेंगे.”

घोषणापत्र में आतंकवाद निरोधक समिति के सचिवालय (CTED) को दिशानिर्देश सिद्धांत विकसित करने के लिये आमंत्रित किया गया है, जिन्हें सभी साझेदारों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद आकार दिया जाएगा.

दस्तावेज़ के मूल में मानवाधिकार

‘दिल्ली घोषणापत्र’ और बैठक में चर्चा के दौरान मानवाधिकारों के लिये सम्मान सुनिश्चित करने पर अत्यधिक बल दिया गया.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने अपने सम्बोधन में सचेत किया कि निर्बलताओं में कमी लाने के लिये ठोस उपाय किये जाने होंगे, डिजिटल जगत में सभी मानवाधिकारों की रक्षा के संकल्प के साथ.

यूएन के शीर्षतम अधिकारी ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि मानवाधिकारों को प्रभावी बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ज़रिये ही हासिल किया जा सकता है.

इस क्रम में, ऐसे उपायों पर बल दिया गया है, जिनकी आधारशिला, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और मानवाधिकारों के लिये सार्वभौमिक घोषणापत्र के मूल्यों व दायित्वों में हो.

मानवाधिकार कार्यालय का प्रतिनिधित्व, डिजिटल टैक्नॉलॉजी टीम के प्रमुख स्कॉट कैम्पबैल ने किया, और उन्होंने यूएन महासचिव के संदेश को दोहराया.

उन्होंने कहा कि आतंकवाद से निपटते समय मानवाधिकारों का सम्मान करना, “हमारी सुरक्षा की रक्षा करने के लिये सतत व कारगर प्रयास सुनिश्चित करने की बुनियाद है.”

उन्होंने आगाह किया कि वे तौर-तरीक़े, जो इन रेखाओं को लांघते हों, वे ना सिर्फ़ क़ानून का उल्लंघन करते हैं, बल्कि आतंकवाद से मुक़ाबले के प्रयासों को भी कमज़ोर करते हैं.

“भरोसे, नैटवर्क और समुदाय को ठेस पहुँचाकर, जोकि सफल हस्तक्षेप व जवाबी प्रतिक्रिया के लिये अति-आवश्यक है.”स्कॉट कैम्पबैल के अनुसार अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकार, इस विषय में अनेक उत्तर प्रस्तुत करते हैं.

उन्होंने ध्यान दिलाया कि सदस्य देशों का दायित्व अपनी आबादी की सुरक्षा की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि उनके आचरण से किसी व्यक्ति के अधिकार का हनन ना हो.

नियामन और सेंसरशिप

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि सोशल मीडिया सामग्री की निगरानी, स्वीकृति और रोक लगाते समय, कम्पनियों और राज्यसत्ता को सतर्क रहना होगा, चूँकि इससे ग़ैर-आनुपातिक ढंग से अल्पसंख्यकों व पत्रकारों पर असर पड़ सकता है.

उन्होंने कहा कि इस चुनौती से उबरने के लिये, पाबन्दियों को सटीकता और बेहद ध्यानपूर्वक, आवश्यकता अनुसार तैयार किये गए क़ानूनों पर आधारित रखना होगा, और इनसे जायज़ अभिव्यक्ति पर रोक लगाने को प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिये.

स्कॉट कैम्पबैल ने इस विषय में पारदर्शी प्रक्रियाओं को अपनाये जाने और स्वतंत्र व निष्पक्ष निरीक्षण संस्थाओं के गठन पर बल दिया है.

इस क्रम में, नियामन विकसित करने, उनका आकलन किये जाने और फिर उन्हें लागू करने में  नागरिक समाज व विशेषज्ञों को सम्मिल्लित किये जाने पर ज़ोर दिया गया है.

बैठक के समापन सत्र के दौरान, समिति की प्रमुख और भारत की राजदूत रुचिरा काम्बोज ने कहा कि निष्कर्ष दस्तावेज़ में मौजूदा चुनौतियों को संज्ञान में लिया गया है, और आतंकी उद्देश्यों के लिये नई व उभरती टैक्नॉलॉजी के प्रयोग से उपजे ख़तरों और अवसरों को सम्बोधित करने के लिये, व्यावहारिक, कार्य-सम्बन्धी, व सामरिक सम्भावनों को प्रस्तुत किया गया है.

उन्होंने कहा कि सदस्य देश डिजिटल आतंक से उपजने वाली नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, और उनकी बदलती आवश्यकताओं के अनुसार, वैश्विक नीति-निर्माता समुदाय को चपल, भविष्योन्मुखी बनना होगा और रचनात्मक सहयोग के साथ आगे बढ़ना होगा.

दिल्ली घोषणापत्र के मुख्य बिंदु

  • दिल्ली घोषणापत्र में, सदस्य देशों ने सहमति जताई कि दिशानिर्देशों और लागू किये जाने वाले उपायों को अंतरराष्ट्रीय क़ानून व मानवाधिकारों पर आधारित होना चाहिये.
  • आतंकवादियों द्वारा सूचना व व संचार प्रौद्योगिकी के दोहन से निपटने के लिये, समिति के सदस्य अनुशंसाओं का मसौदा तैयार करेंगे, भुगतान टैक्नॉलॉजी, धन उगाही के तौर-तरीक़े और मानव रहित वायु प्रणालियों का ग़लत इस्तेमाल समेत अन्य विषयों पर.
  • मानवाधिकारों व बुनियादी स्वतंत्रताओं का सम्मान करते हुए, आतंकी उद्देश्यों के लिये टैक्नॉलॉजी के प्रयोग से निपटने के लिये, सुरक्षा परिषद के सभी प्रासंगिक प्रस्तावों को लागू करने में समिति, सदस्य देशों को सहायता प्रदान करेगी.
  • डिजिटल आतंकवाद का मुक़ाबला करने में सदस्य देशों की मदद करने के लिये, दिशानिर्देशक सिद्धांतों का एक नया मसौदा तैयार किया जाएगा, जोकि क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होगा. इसमें इन ख़तरों से निपटने में वैसी ही टैक्नॉलॉजी के प्रयोग से मिलने वाले अवसरों व सर्वोत्तम तौर-तरीक़ों को जुटाया जाएगा.
  • प्रासंगिक कार्यालय नागरिक समाज के साथ सम्पर्क व बातचीत, सहयोग गहरा करने का संकल्प लेंगे, जिनमें महिलाएं व महिला संगठन, प्रासंगिक निजी-सैक्टर संस्थाएं और अन्य अन्य हितधारक हैं.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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