नस्लवाद और लैंगिकवाद की तरह, ‘निर्धनतावाद’ भी ग़ैरक़ानूनी हो, यूएन विशेषज्ञ |

संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर ने भरोसा जताया कि विश्व भर में जीवन-व्यापन में कठिनाइयों का सामना कर रहे लाखों-करोड़ों लोगों के प्रति नकारात्मक रवैयों को दूर करने के प्रयासों में दुनिया आगे बढ़ सकती है.

ओलिवियर डे शुटर ने हाल ही में यूएन महासभा को बताया कि लोगों के साथ घिसा-पिटा, भेदभाव का रवैया अक्सर केवल इसीलिये अपनाया जाता है चूँकि वे निर्धन है. यह बेहद पीड़ादाई है और हमारे समाज पर धब्बा है.

चरम निर्धनता और मानवाधिकार के विषय पर विशेष रैपोर्टेयर, इस मुद्दे की पड़ताल करती अपनी नवीनतम रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के लिये न्यूयॉर्क स्थित यूएन मुख्यालय आए थे.

उन्होंने यूएन न्यूज़ के साथ एक बातचीत में बताया कि जब लोग अपने जीवन के बारे में बात करते हैं, तो वे अपनी कम आय, या फिर उपयुक्त रोज़गार पाने में अपनी असमर्थता का उल्लेख करते हैं.

मगर, इन चर्चाओं में अनेक अन्य मुद्दे भी सतह तक आते हैं, जैसेकि अनादर व बहिष्करण का अनुभव होना, या केवल सामाजिक-आर्थिक दर्जे पर बुरा बर्ताव किया जाना.

उदाहरणस्वरूप, लोग जब सामाजिक लाभ के लिये आवेदन करते हैं, तो उन्हें सन्देह और तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप, बड़ी मात्रा में सहायता धनराशि के लिये आवेदन नहीं किया जाता.

निर्धनों के साथ भेदभाव

विशेष रैपोर्टेयर के अनुसार, निर्धन होना, केवल सामान व सेवा ख़रीदने के लिये पर्याप्त आय ना होने तक सीमित नहीं है. इसे कलंकित भी किया जाता है, और हेय दृष्टि से देखा जाता है.

यूएन विशेषज्ञ ने बताया कि रोज़गार, आवास, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा सेवाओं की सुलभता में अक्सर इस वजह से भेदभाव किया जाता है.

ओलिवियर डे शुटर ने अपनी रिपोर्ट में ‘निर्धनतावाद’ पर प्रतिबन्ध लगाने की अपील की है, जिससे उनका तात्पर्य निर्धनों के प्रति हानिकारक रवैये व व्यवहार से है.

उन्होंने कहा कि अनेक वर्षों से हमने माना है कि नस्लवाद, लैंगिकवाद, ट्राँस या समलैंगिकों के प्रति भय को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर देना चाहिए और क़ानून में इन पर पाबन्दी होनी चाहिए, चूँकि हमारी दुनिया में इनका कोई स्थान नहीं है.

“ऐसा ही निर्धनतावाद के लिये कहा जाना चाहिए…ग़रीबी में जीवन गुज़ार रहे लोगों के साथ नकारात्मक बर्ताव और भेदभाव किया जाता है, चूँकि वे कम आय पर रहते हैं, चूँकि उनके पास सांस्कृतिक समझ नहीं है, और चूँकि वे अच्छे कपड़े नहीं पहनते, चूँकि उनके बोलने का लहजा ठीक नहीं है.”

मानवाधिकारों पर ध्यान

विशेष रैपोर्टेयर की रिपोर्ट के अनुसार, निर्धनता उन्मूलन तब तक सम्भव नहीं है, जब तक निर्धनतावाद जीवित रहेगा.

इसके मद्देनज़र, उन्होंने देशों की सरकारों से आग्रह किया है कि लोगों की बेहतर रक्षा सुनिश्चित करने के लिये भेदभाव की रोकथाम के लिये क़ानूनों की समीक्षा की जानी होगी.

साथ ही, प्रशासनिक एजेंसियों से निर्धनता उन्मूलन के लिये ‘परोपकारी’ तौर-तरीक़े त्याग कर मानवाधिकारों की रक्षा करने और सशक्तिकरण को समर्थन देने की अनुशंसा की गई है.  

उन्होंने ध्यान दिलाया कि निर्धनता को मानवाधिकारों के हनन के रूप में देखा जाना चाहिए, और निर्धनता में जीवन गुज़ार रहे लोगों को यदि आवास, शिक्षा, रोज़गार अवसरों समेत सामाजिक संरक्षा के दायरे से बाहर रखा जाता है, तो उन्हें ज़रूरी सहारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

सामाजिक संरक्षा पर बल

विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को निर्धनता का उन्मूलन करने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिये और अधिक प्रयास करने होंगे.

इस क्रम में, निम्न-आय वाले देशों को सहारा प्रदान किया जाना अहम है, जहाँ 71 करोड़ लोग बसते हैं.

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक अनुमान के अनुसार, इन देशों में सामाजिक संरक्षा कार्यक्रमों को स्थापित करने के लिये वार्षिक 79 अरब डॉलर की धनराशि की आवश्यकता होगी.

इस धनराशि का प्रबन्धन करने के लिये ओलिवियर डे शुटर और यूएन श्रम एजेंसी ने सामाजिक संरक्षा के लिये एक वैश्विक कोष स्थापित किये जाने का सुझाव दिया है.

अनूठा अवसर

विशेष रैपोर्टेयर से जब टिकाऊ विकास लक्ष्य को वर्ष 2030 की समय सीमा तक हासिल करने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने माना कि आशावादी होने की फ़िलहाल कोई विशेष वजह नहीं है.

यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद से विश्व भर में खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति का संकट गहरा हुआ है. साथ ही, कोविड-19 महामारी से उपजे प्रभावों के परिणामस्वरूप, अत्यधिक निर्धनता में रहने वाले लोगों की संख्या में साढ़े नौ करोड़ की वृद्धि होने की सम्भावना है.

उन्होंने कहा कि ये संकट देशों के लिये एक अनूठा अवसर भी हैं, जिसका उपयोग सामाजिक संरक्षा प्रणालियों में मौजूदा कमज़ोरियों को दूर करने में किया जा सकता है.

विशेष रैपोर्टेयर ने कहा कि यह सराहनीय है कि अनेक देशों ने कोविड-19 महामारी के बाद से अब तक, सामाजिक संरक्षा व्यवस्थाओं को अपनाया है, मौजूदा प्रणालियों में विस्तार किया है और नई योजनाएँ भी लागू की गई हैं.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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