‘हरित लीपापोती’ के बजाय, ठोस कार्रवाई एवं जलवायु निवेश पर बल |

डॉक्टर प्रकाश के अनुसार IPCC की चौथी समीक्षा रिपोर्ट के दौरान जलवायु परिवर्तन को नकारने वाले स्वर मुखर हुए जोकि कुछ हद तक पाँचवी समीक्षा रिपोर्ट आने पर शान्त हो गए. उन्होंने बताया कि अब छठी रिपोर्ट के बाद उन्हें नहीं लगता कि बड़े स्तर पर जलवायु परिवर्तन को नकारा जाता है, और यह राजनैतिक दृष्टि से भी सही नहीं है.

इस बदलाव के बावजूद अब ‘हरित लीपापोती’ एक नई चुनौती है. मोटे तौर पर इसका अर्थ है, सरकारों और कम्पनियों द्वारा किए जाने वाले ऐसा भ्रामक वायदे, जिनमें नैट-शून्य कार्बन उत्सर्जन संकल्पों और पर्यावरण संरक्षण के लिये ज़ोर-शोर से दावे किए जाएं, मगर वास्तविकता उसके उलट हो.

डॉक्टर प्रकाश का मानना है कि ‘हरित लीपापोती’ बहुत अधिक दिखाई देने लगी है — जलवायु कार्रवाई के लिए बातें तो बहुत की जा रही हैं, मगर, कार्रवाई बहुत कम है.”

यूएन के शीर्षतम अधिकारी एंतोनियो गुटेरेश ने भी कॉप27 सम्मेलन के दौरान एक विशेषज्ञ समूह द्वारा तैयार एक रिपोर्ट को जारी करते हुए चिंता जताई थी कि नैट-शून्य उत्सर्जन प्रतिबद्धताओं के लिए तय मानदण्डों में बचाव के इतने रास्ते हैं कि उनके बेअसर होने की आशंका बढ़ जाती है.

आईपीसीसी की छठी समीक्षा रिपोर्ट के मुख्य लेखक और भारती इन्स्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में शोध निदेशक, डॉक्टर अंजल प्रकाश.

आईपीसीसी की छठी समीक्षा रिपोर्ट के मुख्य लेखक और भारती इन्स्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी में शोध निदेशक, डॉक्टर अंजल प्रकाश.

डॉक्टर प्रकाश के अनुसार पेरिस समझौते और उससे इतर भी अनेक वायदे और संकल्प लिए गए हैं मगर अभी तक उन्हें मूर्त रूप नहीं दिया गया है.

“हरित लीपापोती निश्चित रूप से एक ऐसा मुद्दा है, जिसका सीधे तौर पर मुक़ाबला करना होगा. हमें यह बार-बार इंगित करने की आवश्यकता है कि पर्याप्त क़दम नहीं उठाए जा रहे हैं, और अधिक कार्रवाई की आवश्यकता है.”

उन्होंने कहा कि औद्योगिक देशों की अनिच्छा के बावजूद कॉप27 सम्मेलन में ‘हानि व क्षति’ के मुद्दे को एजेंडा में शामिल किया गया है, और यह दर्शाता है कि ये मुद्दे कितने अहम हैं और उन पर कार्रवाई की अब भी ज़रूरत है.

एशिया में जलवायु परिवर्तन 

जलवायु परिवर्तन पर एशिया निवेशक समूह (AIGCC) की नीति निदेशक अंजलि विस्वामोहनन भी शर्म अल-शेख़ में कॉप27 सम्मेलन में हिस्सा ले रही हैं. उनका मुख्य ध्यान एशियाई निवेश समुदाय को टिकाऊ विकास की दिशा में प्रोत्साहित करना है.

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि एशिया क्षेत्र में स्थित देशों में हर साल जलवायु परिवर्तन के प्रभाव देखे जा रहे है, और अनेक बड़े शहरों में रह पाना कठिन होता जा रहा है.

उदाहरणस्वरूप, इंडोनेशिया में राजधानी अब जकार्ता से हटाकर किसी और शहर ले जाए जाने की योजना है, चूँकि कुछ साल बाद भूमि के जलमग्न हो जाने की आशंका है.

“स्थानीय समुदायों को यहाँ हर साल बाढ़, ताप लहरों से जूझना पड़ रहा है. मेरा मानना है कि एशिया में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव साल-दर-साल बढ़ते हुए महसूस किए जा रहे हैं.”

यही वजह है कि इन देशों को भविष्य में बदलती परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु उपाय करने होंगे और इस क्रम में, टिकाऊ विकास के लिए निवेश बहुत अहम है.

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में वित पोषण, समाधानों का एक बड़ा हिस्सा है.

अंजलि विस्वामोहनन का मानना है कि मौजूदा चिंताओं और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सरकारों, वित्तीय संस्थाओं, निजी सैक्टर समेत सभी हितधारकों की ओर से प्रभावी कार्रवाई की दरकार है, और इसमें निवेशकों की एक अहम भूमिका है.

जलवायु परिवर्तन पर एशिया निवेशक समूह की नीति निदेशक अंजलि विस्वामोहनन.

जलवायु परिवर्तन पर एशिया निवेशक समूह की नीति निदेशक अंजलि विस्वामोहनन.

प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताएँ

एशिया क्षेत्र में स्थित देश कोविड-19 महामारी की चुनौती से उबरते हुए अब फिर से अपनी आर्थिक प्रगति की गति बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं.

नीति निदेशक अंजलि विस्वामोहनन के अनुसार नीति निर्धारकों के लिए यह परम आवश्यक है कि नीतियाँ तैयार करते समय जलवायु अनुकूलन और कार्बन उत्सर्जन में कटौती लाने के उपायों को भी शामिल किया जाए.

इस क्षेत्र में अनेक विशाल, उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिन्हें पारस्परिक प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताओं का सामना करना पड़ता है.

जैसेकि निर्धनता घटाने और अन्य विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने में सन्तुलन साधने की चुनौती.

नीति निदेशक अंजलि विस्वामोहनन ने बताया कि बहुत से देशों ने बड़े स्तर पर कोयले में निवेश किया है और फ़िलहाल उनकी अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक उस पर निर्भर है, और इस वजह से उन्हें इसके इस्तेमाल से दूर हटने में समय लगेगा.

जलवायु कार्रवाई और भारत

डॉक्टर प्रकाश ने तेज़ी से उभरती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था का उदाहरण दिया, जहाँ लगभग अमेरिकी आबादी के बराबर, निर्धनता के गर्त में धँसे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास किया जा रहा है.

इस प्रक्रिया में निश्चित रूप से अधिक मात्रा में ऊर्जा की खपत और उसकी सुलभता की आवश्यकता होगी.

मगर, भारत अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए काफ़ी हद तक जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर भी निर्भर है, जोकि वैश्विक तापमान मे वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हैं, और जिसका सामना भारत भी कर रहा है.

डॉक्टर प्रकाश ने बताया कि निर्धन आबादी के विशाल आकार और विकास आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत ने जलवायु वार्ताओं के दौरान कार्बन उत्सर्जन कटौती के लिए न्यायसंगत जलवायु उपायों की मांग की है.

उनके अनुसार यह ध्यान रखा जाना होगा कि अमेरिका और चीन समेत अन्य देशों की तुलना में भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन विश्व में बहुत कम है और साधनों की बेशुमार खपत नहीं होती है.  

भारत ने वर्ष 2070 में नैट-शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, मगर इस दौरान अन्य महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव भी किए जाएंगे.

उदाहरणस्वरूप, नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ते हुए सौर और पवन ऊर्जा के उपयोग पर बल दिया जा रहा है. साथ ही, ऊर्जा-दक्ष एलईडी बल्ब के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया गया है, और भारत के तीन-चौथाई हिस्से में ये सस्ते बल्ब निर्धन परिवारों के लिए भी उपलब्ध हैं.

नए ऊर्जा भविष्य की ओर

अंजलि विस्वामोहनन ने ध्यान दिलाया कि वैश्विक उत्सर्जन के मामले में दुनिया फ़िलहाल जिन परिस्थितियों का सामना कर रही है, उसके लिए मोटे तौर पर विकासशील देश ज़िम्मेदार नहीं हैं, और इसलिए नए ऊर्जा भविष्य की दिशा में बढ़ने के लिए उन्हें वित्तीय संसाधनों का भार वहन करने के लिए मजबूर नही किया जाना चाहिए.

उनके अनुसार वैश्विक स्तर पर संकल्प लेने में इन देशों की हिचकिचाहट का यही एक मुख्य कारण है. वित्त पोषण के अभाव में अनेक विकास प्राथमिकताओं और जलवायु कार्रवाई में एक साथ सन्तुलन साध पाना सम्भव नहीं है.

इसलिए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का एकमात्र रास्ता है: जलवायु वित्त पोषण.

थाईलैण्ड में एक सौर ऊर्जा फ़ार्म.

थाईलैण्ड में एक सौर ऊर्जा फ़ार्म.

अंजलि ने कहा कि अन्तत: हर एक देश एक विकसित राष्ट्र बनना चाहता है और अपने सभी नागरिकों को वो सभी सुविधाएं देना चाहता है, जैसाकि शेष दुनिया में है.

इसलिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन, हानि व क्षति आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये जिस धनराशि की आवश्यकता है उसे अन्तरराष्ट्रीय जलवायु वित्त समर्थन के ज़रिये आना होगा.

डॉक्टर प्रकाश का भी मानना कि देशों के समक्ष मौजूद चुनौतियों के बावजूद हरित विकास प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी होगी, चूँकि पर्यावरण को प्रदूषित किए बिना भी विकास सम्भव है.  

मगर, विशेषज्ञों ने सचेत किया कि जलवायु वित्त पोषण के प्रवाह को सुनिश्चित करने में जितनी देरी होती है, उतना ही इस रक़म में वृद्धि होती जाएगी, चूँकि हर साल जलवायु जोखिमों में वृद्धि हो रही है.

उसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कटौती और अनकूलन के लिये भी अधिक रक़म की आवश्यकता होगी, इसलिए उसे जल्द सुनिश्चित किया जाना समय की मांग है.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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