ILO: लगभग 23 प्रतिशत लोग हैं, कार्यस्थलों पर हिंसा से पीड़ित

आईएलओ ने सोमवार को जारी एक प्रैस विज्ञप्ति में कहा है कि कार्यस्थलों पर हिंसा और प्रताड़ना का अनुभव किए जाने के विषय पर इस प्रथम वैश्विक सर्वे का उद्देश्य, एक ऐसे मुद्दे पर बेहतर समझ व जागरूकता उपलब्ध कराना है जोकि जटिल आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों में जड़ें जमाए हुए है.

इस सर्वे में समस्या के दायरे का आकलन किया गया है और उन कारकों पर भी नज़र डाली गई है जो लोगों को कार्यस्थलों पर अपने नकारात्मक अनुभवों के बारे में बात करने से रोकते हैं, जिनमें शर्म, ग्लानि और संस्थानों में विश्वास का अभाव, या फिर ऐसे अस्वीकार्य बर्तावों को ‘सामान्य’ मान लिया जाना शामिल है.

प्रकटन का अभाव

कामकाज के स्थानों पर हिंसा और प्रताड़ना को मापना कठिन है. रिपोर्ट में पाया गया है कि दुनिया भर में पीड़ितों की केवल आधी संख्या ने ही अपने अनुभव किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा किए, वो भी तब, जब उनके साथ बार-बार इस तरह का बर्ताव हुआ.

इस तरह के अनुभव किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा नहीं करने का बहुत प्रचलित कारण – “समय की बर्बादी” बताया गया, जिसके परिणामस्वरूप, जिन लोगों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, उन्हें अपनी प्रतिष्ठा पर आँच आने का भी डर रहा.

इस तरह के अनुभव साझा करने वालों में महिलाओं (60.7%) की संख्या, पुरुषों (50%) की तुलना में ज़्यादा दर्ज की गई.

वैश्विक स्तर पर रोज़गार शुदा पुरुषों और महिलाओं की 17.9 प्रतिशत संख्या ने कहा कि उन्हें अपने कामकाजी जीवन में किसी ना किसी समय मनोवैज्ञानिक हिंसा और प्रताड़ना का अनुभव करना पड़ा है. और 8.5 प्रतिशत को शारीरिक हिंसा b उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है.

सर्वाधिक जोखिम में

कार्यस्थलों पर हिंसा और प्रताड़ना का सामना करने वालों में, दुनिया भर के लोग शामिल हैं और महिलाएँ ज़्यादा प्रभावित हैं.

कार्यस्थलों पर हिंसा और प्रताड़ना का सामना करने वालों में, दुनिया भर के लोग शामिल हैं और महिलाएँ ज़्यादा प्रभावित हैं.

आँकड़ों के अनुसार युवजन, प्रवासी जन, और वेतनभोगी महिलाओं व पुरुषों को हिंसा का अनुभव करने का सबसे ज़्यादा जोखिम है. इनमें यौन हिंसा b उत्पीड़न का जोखिम भी शामिल है.

पाँच में से तीन पीड़ितों का कहना है कि उन्हें हिंसा व उत्पीड़न का सामना अनेक बार करना पड़ा है और, उनमें से बहुसंख्या वाले लोग ऐसे थे जिन्हें ये अनुभव गत पाँच वर्षों के दौरान करना पड़ा है.

आईएलओ के प्रशासन, अधिकार व संवाद मामलों के लिये सहायक महानिदेशिका मैनुएला तोमेई का कहना है, “ये जानना बहुत तकलीफ़देह है कि लोगों को अपने कामकाज के स्थानों पर हिंसा और प्रताड़ना का सामना, केवल एक बार नहीं, बल्कि बार-बार करना पड़ता है.”

आगे का रास्ता कठिन

मैनुएला तोमेई का कहना है कि मनोवैज्ञानिक हिंसा और प्रताड़ना, तमाम देशों में फैली हुई है, और महिलाएँ विशेष रूप से यौन हिंसा व उत्पीड़न के बढ़े हुए स्तर का सामना करती हैं.

“रिपोर्ट हमें, कामकाजी दुनिया में, हिंसा और उत्पीड़न का अन्त करने के लिए, आगे दरपेश कार्रवाई व ज़िम्मेदारी की विशालता के बारे में बताती है. मुझे आशा है कि इस रिपोर्ट से, ज़मीनी कार्रवाई करने और आईएलओ कन्वेंशन 190 की स्वीकृति व क्रियान्वयन की दिशा में कार्रवाई तेज़ होगी.”

रिपोर्ट में इस समस्या से निपटने के लिए, कुछ सिफ़ारिशें भी पेश की गई हैं.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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