प्रजनन हिंसा – एक पुरानी समस्या से निपटने के लिये एक नई शब्दावली

बच्चे पैदा करने या नहीं का फ़ैसला, एक व्यक्ति के लिये सबसे बड़े जीवन-परिवर्तनकारी निर्णयों में से एक होता है. भारत में एक व्यक्ति ने रिपोर्ट के लेखकों को बताया, “पुरुषों में [गर्भनिरोधक का प्रयोग करने के सम्बन्ध में] निर्णय लेने की शक्ति अधिक होती है. अक्सर महिलाओं को गुप्त रूप से या चुपचाप गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करना पड़ता है.”

वहीं सूडान की एक महिला ने बताया, “पुरुष के पास अन्तिम निर्णय लेने की शक्ति होती है. स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए पति की सहमति मांगना आम बात है.”

हालाँकि महिलाओं के प्रजनन फ़ैसले में सदियों से अन्य लोगों का हस्तक्षेप चलता आ रहा है, लेकिन पिछले दशक से शोधकर्ताओं ने इस अवधारणा को पहचानना और अधिक जानने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. उन्होंने इसे प्रजनन हिंसा का नाम दिया है.

प्रजनन हिंसा के क्या मायने हैं?

प्रजनन सम्बन्धी हिंसा में दुर्व्यवहार, ज़बरदस्ती भरा व्यवहार, भेदभाव, शोषण या हिंसा का कोई भी रूप शामिल हो सकता है, जिससे किसी भी व्यक्ति की प्रजनन स्वायत्तता से समझौता होता हो.

लिंग आधारित हिंसा का यह रूप भागीदारों, रिश्तेदारों और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं जैसे व्यक्ति या पूरे समुदाय कर सकते हैं, क्योंकि सामाजिक मानदंड सामाजिक विचारों को प्रभावित करते हैं कि किसे माता-पिता बनना चाहिए या नहीं बनना चाहिए.

इसके अलावा, सरकारें भी, अक्सर क़ानूनों और संस्थानों के ज़रिए, गर्भ निरोधकों तक पहुँच रोककर या उदाहरण के लिये जबरन नसबन्दी अभियान चलाकर, हिंसा के इस रूप को लागू करने में सहायक हो जाती हैं.

दुनिया भर में बहुत सी महिलाओं को अपने लिए प्रजनन सम्बन्धी निर्णयों से वंचित रखा जाता है.

© UNICEF/Mithila Jariwala

दुनिया भर में बहुत सी महिलाओं को अपने लिए प्रजनन सम्बन्धी निर्णयों से वंचित रखा जाता है.

पारस्परिक स्तर पर, प्रजनन हिंसा, एक साथी के अपने साथी का गर्भनिरोधक छिपाने, नष्ट करने या बलपूर्वक हटाने या फिर “चुपके से” सहमति के बिना सम्भोग के दौरान कॉण्डोम हटाने को कही जा सकती है.

वहीं, गर्भधारण होने पर कुछ महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध माँ बनने और अन्य को गर्भपात करने के लिए मजबूर करने को भी प्रजनन हिंसा की श्रेणी में रखा जाता है.

बेटी को जन्म देने का अभिशाप

भारत के राजस्थान प्रदेश की 58 वर्षीय जसबीर कौर ने 2020 में यूएनएफ़पीए को बताया कि जब उसके ससुराल वालों को मालूम हुआ कि उसके गर्भ में पल रही तीनों सन्तानें लड़कियाँ हैं, तो उन्होंने उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की.

जसवीर कौर ने बताया, “पिछली तीन पीढ़ियों में मेरे पति के परिवार में कोई बेटी पैदा नहीं हुई थी. उन्होंने मुझसे कहा, हम एक साथ घर में तीन बेटियों को पैदा नहीं होने देंगे. उन्होंने मुझे अल्टीमेटम दिया: या तो गर्भपात करवाओ या घर छोड़ दो.”

जसबीर कौर के ससुराल वालों ने उनसे यह मांग करके, उन हानिकारक सामाजिक और लैंगिक मानदंडों को क़ायम रखने में भाग लिया, जो लड़कियों की तुलना में लड़कों को अधिक महत्व देते हैं. वहीं, जसबीर के समुदाय के लोग भी पुत्र न होने के कारण उन्हें “बेचारी” समझकर, इस भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण को पुष्ट करते रहे.

जसबीर कौर के पड़ोसियों में से एक ने यूएनएफ़पीए को बताया, “यहाँ, अब भी लोगों की धारणा यही है… कि आप एक माँ के तौर पर तब तक सफल नहीं हो, जब तक आप एक बेटे को जन्म नहीं दे देतीं.”

लेकिन जसबीर कौर ने इन मानदंडों और प्रथाओं का डटकर सामना किया. उन्होंने अपने पति और उसके परिवार को छोड़कर अपने बच्चों को जन्म देने का फ़ैसला किया. आज, उनकी तीनों बेटियाँ, मनदीप, सन्दीप और प्रदीप, सभी 24-25 साल की हैं, और कला, व्यवसाय एवं स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में अपना करियर बना रही हैं.

उनकी बेटी सन्दीप गर्व से कहती हैं, “आज लोग हमें जसबीर कौर की बेटियों के रूप में जानते हैं. हम अपने जीवन में कुछ करके दिखाना चाहते हैं.

समस्या का समाधान

हालाँकि जैसा कि जसबीर के मामले में हुआ, प्रजनन सम्बन्धी हिंसा में अक्सर साथी और परिवार के सदस्य शामिल होते हैं, लेकिन वे अकेले अपराधी नहीं होते. सरकारें और संस्थानें भी कठोर क़ानूनों व नीतियों के ज़रिये प्रजनन सम्बन्धी हिंसा के कार्य में सहायक बनती हैं, जिनमें से कुछ का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनन क्षमता नियंत्रित करना होता है.

वैश्विक जनसंख्या के 8 अरब पर पहुँचने पर, अब देश अपनी जनसंख्या नीतियों पर फिर काम करने लगे हैं. नए साक्ष्य सामने आए हैं, जिनमें प्रजनन क्षमता बढ़ाने की मांग करने वाले देशों में समस्याग्रस्त तरीक़े अपनाए जा रहे हैं, जिसमें गर्भपात तक पहुँच सीमित करना एवं स्कूलों में यौन शिक्षा कम करना शामिल है.

यूएनएफ़पीए ने चेतावनी दी है कि जनसंख्या के आकार से छेड़छाड़ करने के इन प्रयासों का आमतौर पर अल्पावधि में प्रजनन क्षमता पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, और लम्बी अवधि में इससे बड़ी समस्या पैदा हो सकती है.

यूएनएफ़पीए की कार्यकारी निदेशक, डॉक्टर नतालिया कनेम ने 14 नवम्बर को TIME के एक OP-ED में कहा, “केवल संख्या पर ध्यान केन्द्रित करना, लोगों के अधिकारों और मानवता को छीनकर उन्हें वस्तुमात्र बना देता है. हमने अक्सर नेताओं को जनसंख्या के आकार या प्रजनन दर के लिये लक्ष्य निर्धारित करते हुए देखा है, और इसके परिणामस्वरूप गम्भीर मानवाधिकार हनन होते हैं.”

स्पष्ट रूप से कहें तो: जब हम प्रजनन दर या ‘आदर्श’ जनसंख्या आकार के साथ ‘समस्या’ के बारे में बात करते हैं, तो हम वास्तव में लोगों के शरीर को नियंत्रित करने के बारे में बात कर रहे हैं. हम उनकी प्रजनन क्षमता पर अपनी शक्ति थोप रहे हैं, चाहे प्रभाव से या बल से, उन नीतियों से, जहाँ परिवारों को या तो अधिक बच्चे पैदा करने के लिये धन का प्रलोभन दिया जाता है, या फिर जबरन नसबन्दी जैसे घोर उल्लंघन होते हैं, जिनका ख़ासतौर पर जातीय अल्पसंख्यक, स्थानीय समुदाय व विकलांगों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है.”

आज, अनेक महिलाओं का अपने प्रजनन जीवन पर कोई नियंत्रण है. यूएनएफ़पीए के मुताबिक़ 64 देशों में, 8 प्रतिशत से अधिक महिलाओं में गर्भनिरोधक पर निर्णय लेने की शक्ति का अभाव है, और लगभग एक चौथाई महिलाओं में सैक्स को ना कहने की हिम्मत नहीं है.

वर्तमान में UNFPA, प्रजनन सम्बन्धी हिंसा को लेकर, एक तकनीकी पेपर तैयार करने पर काम कर रही है और स्वास्थ्य देखभाल चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, संस्थानों व सरकारों को यह पहुँचानने में मदद करने के लिये एक माप उपकरण विकसित कर रहा है कि ये उल्लंघन कहाँ, कब और कैसे हो रहे हैं.

समाजों को इस मुद्दे को हल करने और लोगों के अधिकारों एवं विकल्पों की रक्षा करने में मदद करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण क़दम होगा.

डॉक्टर नतालिया कनेम ने कहा, “8 अरब लोगों की एक सहनसक्षम दुनिया, एक ऐसी दुनिया हो, जो व्यक्तिगत अधिकारों और विकल्पों को बरक़रार रखे, लोगों, समाजों व हमारे साझा ग्रह के फलने-फूलने एवं समृद्ध होने की असीम सम्भावनाएँ प्रदान करती हो.”

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *