ईरान: प्रदर्शनकारियों को दंडित करने के लिये, मृत्युदंड के प्रयोग की निन्दा

जिनीवा में यूएन मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने मंगलवार को वोल्कर टर्क की ओर से एक वक्तव्य जारी किया जिसमें कहा गया है कि ईरान की सरकार आपराधिक न्याय प्रक्रिया और मृत्यदंड का इस्तेमाल, एक हथियार के तौर पर, असहमति के स्वरों को दबाने के लिये कर रही है.

ईरान की तथाकथित नैतिकता पुलिस ने, महसा अमीनी को सही तरीक़े से हिजाब नहीं पहनने के आरोप में 13 सितम्बर को गिरफ़्तार किया था.

कुछ ही दिन बाद पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई, जिसके बाद भड़के देशव्यापी प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और हज़ारों लोग हिरासत में लिये गए.

प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के आरोप में, पिछले कुछ हफ़्तों में चार लोगों को मौत की सज़ा दी जा चुकी है.

वोल्कर टर्क ने कहा है कि संगठित विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने समेत अपने अन्य बुनियादी अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे लोगों को दंडित करने के लिये, आपराधिक प्रक्रिया का हथियार के तौर पर इस्तेमाल, राज्यसत्ता की अनुमति से लोगों को जान से मारना है.

“ईरान की सरकार अपने व लोगों के हितों का बेहतर ढमग से ध्यान उनकी पीड़ाओं को सुनकर रख पाएगी.”

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने ईरानी प्रशासन से क़ानूनी व नीतिगत सुधारों को लागू करने का आग्रह किया है, ताकि मत भिन्नता का सम्मान सुनिश्चित किया जा सके.

साथ ही, अभिव्यक्ति व शान्तिपूर्ण ढंग से एकत्र होने की आज़ादी के अधिकार और जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों का पूर्ण सम्मान व रक्षा की जानी होगी.

मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने बताया कि जिन प्रदर्शनकारियों को मौत की सज़ा दी गई, उन पर मामले की सुनवाई बहुत तेज़ी से की गई.

संगठन के अनुसार यह अदालती कार्रवाई अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के अन्तर्गत, निष्पक्ष मुक़दमे की कार्रवाई की गारंटी को पूरा करने में विफल रहीं, जबकि यह ईरान के लिये बाध्यकारी है.

रवीना शमदासानी के अनुसार संयुक्त राष्ट्र राष्ट्र हर हालात में, ईरान में राज्यसत्ता द्वारा लोगों को जान से मार दिये जाने के विरुद्ध है.

“समुचित प्रक्रिया के लगभग पूर्ण अभाव, यातना और बुरे बर्ताव के इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए, हम कह रहे हैं कि ये ना केवल लोगों को जान से मारा जाना है, बल्कि ये राज्यसत्ता की अनुमति प्राप्त हत्याएँ हैं – राज्यसत्ता द्वारा मनमाने ढंग से जीवन से वंचित कर दिया जाना.”

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय के अनुसार, जल्द ही दो अन्य प्रदर्शनकारियों – 19 वर्षीय मोहम्मद बोरउघनी और 22 वर्षीय मोहम्मद घोबऐदीयु – को मौत की सजा दिये जाने की आशंका है.

यूएन कार्यालय ने अदालती सुनवाई में न्यायोचित प्रक्रिया के अभाव और मुक़दमे की निष्पक्ष कार्रवाई की गारंटी के हनन में निम्न बातों का उल्लेख किया.

आपराधिक मामले में अस्पष्ट भाषा का इस्तेमाल, क़ानूनी बचाव के लिये वकील तक पहुँच ना होना, यातना और बुरे बर्ताव से जबरन अपराध स्वीकार करने का दबाव डालना, व्यक्ति को निर्दोष मानने की परिपाटी का सम्मान करने में विफल रहना और अपील के अधिकार को नकार देना.

वोल्कर टर्क ने अपने वक्तव्य में कहा है कि हाल के दिनों में मौत की सज़ा सुनाए जाने के मामले, कथित रूप से ईश्वर के विरुद्ध युद्ध छेड़ने और पृथ्वी पर भ्रष्टाचार करने के आरोपों में दोषी पाए जाने पर दिये गए हैं.

‘निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन नहीं’

वक्तव्य के अनुसार ये आरोप, अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून की उस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं, जोकि क़ानूनी रूप से किसी को मौत की सज़ा दिये जाने के लिये ज़रूरी है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने रिपोर्ट्स का उल्लेख करते हुए बताया कि मोहसिन शेकारी को 8 दिसम्बर 2022 को मौत की सज़ा दी गई, जोकि ऐसा पहला मामला था.

इसके चार दिन बाद ही, 12 दिसम्बर को माजदीरेज़ा रहानावर्द को उनकी गिरफ़्तारी के केवल 23 दिन बार मौत की सज़ा दे दी गई.

7 जनवरी 2023 को मोहम्मद मेहदी करामी और मोहम्मद हौसेनी को मौत की सज़ा दी गई, और इन सभी को सज़ा देते जाते समय, उनके परिवार को सूचना नहीं दी गई.

“यह अपने आप में अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून का एक उल्लंघन है.”

बताया गया है कि अब तक कम से कम 17 अन्य लोगों को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है और क़रीब 100 लोगों पर अधिकतम दंड के लिये आरोप निर्धारित किये गए हैं.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

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