तस्करी पीड़ितों की शिनाख़्त में, महामारी समेत अन्य संकटों के कारण उपजी बाधाएँ

मंगलवार को प्रकाशित, ‘मानव तस्करी पर वैश्विक रिपोर्ट’ के अनुसार विश्व भर में, जिन भुक्तभोगियों का पता चल पाया, उनकी संख्या में वर्ष 2020 में 2019 की तुलना में 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.

यूएन विशेषज्ञों के अनुसार निम्न- और मध्यम-आय वाले देशों में तस्करी के पीड़ितों की संख्या का कम ही पता चल पाया.

ये रिपोर्ट तैयार करने के लिए, 141 देशों से 2017-2020 की अवधि में आँकड़े जुटाए गए है और लगभग 800 अदालती मामलों का विश्लेषण किया गया है.

तस्करी सम्बन्धी अपराधों के लिए दोषी पाए गए लोगों की संख्या में भी, इस अवधि के दौरान 27 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जिससे 2017 से जारी एक दीर्घकालिक रुझान नज़र आता है.

दक्षिण एशिया में तेज़ गिरावट (56 प्रतिशत) दर्ज की गई है जबकि मध्य अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र में यह आँकड़ा 54 प्रतिशत और दक्षिण अमेरिका में 46 प्रतिशत है.

यूएन एजेंसी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक महामारी के कारण मानव तस्करी के लिए अवसरों की कमी हुई, मगर साथ ही, पीड़ितों का पता लगाने के लिए विधि प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता भी कमज़ोर होने की आशंका है.

यूएन कार्यालय की कार्यकारी निदेशिका ग़ादा वॉली ने कहा, “हम संकटों को इस शोषण को और अधिक गहरा बनाने की अनुमति नहीं दे सकते हैं.”

“यूएन और दानदाता समुदाय को राष्ट्रीय प्रशासन के लिए समर्थन प्रदान करना आवश्यक है, जिनमें से अधिकांश विकासशील देशों में हैं, ताकि तस्करी के ख़तरों से निपटा जा सके, और भुक्तभोगियों की पहचान व संरक्षण हो सके, विशेष रूप से आपात स्थितियों के दौरान.”

अध्ययन के अनुसार, वैश्विक महामारी के दौरान सार्वजनिक स्थलों के बन्द हो जाने की वजह से, यौन शोषण के लिए की जाने वाली तस्करी के मामलों का कम संख्या में ही पता लग पाया.

स्वयं बचने वाले भुक्तभोगी

आशंका जताई गई है कि कोविड-19 के दौरान लागू की गई पाबन्दियों के कारण गुपचुप, छिपे ढंग से कम सुरक्षित स्थानों पर तस्करी को अंजाम दिया गया, जिससे भुक्तभोगियों की शिनाख़्त कर पाना कठिन हो गया.

अदालत में मामलों का विश्लेषण बताता है कि तस्करी के जिन पीड़ितों की शिनाख़्त की गई है, वे उनके चंगुल से अपने आप बच निकलने में सफल रहे और असल में उन्होंने स्वयं को अपने आप बचाया है.

बच कर भाग निकलने वाले 41 प्रतिशत पीड़ितों ने, स्वयं आगे आकर प्रशासनिक एजेंसियों को अपने अनुभव के बारे में जानकारी दी, जबकि क़ानून एजेंसियों ने 28 प्रतिशत भुक्तभोगियों का पता लगाया.

लगभग 11 प्रतिशत पीड़ितों का पता लगाने में समुदाय और नागरिक समाज ने भूमिका निभाई है.

रिपोर्ट दर्शाती है कि यह विशेष रूप से चिन्ताजनक है चूँकि अनेक अपने आप को पीड़ित के तौर पर नहीं दिखाना चाहते, या फिर उन्हें इतना डर लग सकता है कि वे बच कर भाग निकलने की कोशिश ही ना करें.

एशिया और मध्य पूर्व में बच्चों व महिलाओं के लिये, मानव तस्करी का शिकार होने का जोखिम अधिक है.

© UNICEF/Shehzad Noorani

एशिया और मध्य पूर्व में बच्चों व महिलाओं के लिये, मानव तस्करी का शिकार होने का जोखिम अधिक है.

युद्ध व हिंसक टकराव

रिपोर्ट बताती है कि युद्ध और हिंसक टकराव की परिस्थितियाँ, तस्करों को शोषण का अवसर प्रदान करती हैं. उदाहरणस्वरूप, यूक्रेन में जारी युद्ध के कारण लाखों विस्थापितों के लिए मानव तस्करी का शिकार होने का जोखिम बढ़ा है.

बड़ी संख्या में भुक्तभोगी अफ़्रीका और मध्य पूर्व में स्थित देशों से सम्बन्ध रखते हैं, और उन्हें तस्करी के ज़रिए वहाँ भेजा भी जाता है.

सब-सहारा अफ़्रीका और दक्षिण एशिया में ऊँचे स्तर पर दंडमुक्ति की भावना भी एक समस्या बताई गई है. इन क्षेत्रों के देशों में कम संख्या में ही तस्करों पर दोष साबित होता है और शेष दुनिया की तुलना में कम संख्या में ही पीड़ितों का पता चल पाता है.

अदालती मामलों की पड़ताल में पाया गया कि महिला भुक्तभोगियों को तस्करों के हाथों अक्सर शारीरिक व चरम हिंसा का शिकार होना पड़ता है, और पुरुष पीड़ितों की अपेक्षा यह तीन गुना है.

वयस्कों के मुक़ाबले, बच्चों को पकड़ लिए जाने और उनकी तस्करी किए जाने की आशंका दोगुना अधिक होती है.

रिपोर्ट के अनुसार, मानव तस्करी के आरोप में जो महिलाएँ जाँच के दायरे में आती हैं, उनके दोषी क़रार दिए जाने की सम्भावना पुरुषों की तुलना में अधिक होती है.

विशेषज्ञों ने कहा कि यह न्याय व्यवस्था द्वारा महिलाओं के साथ भेदभाव की आशंका को बल देती है और यह भी कि तस्करी नैटवर्क में महिलाओं की भूमिका, उनके लिए इस अपराध में दोषी ठहराए जाने की सम्भावना भी बढ़ाती है.

Source: संयुक्त राष्ट्र समाचार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *