सूडान के जल संकट से निपटने के लिए प्रयासरत महिलाएँ


स्थानीय किसान नीमा एलमसाद ने लगभग सात साल पहले मौसम में बदलाव महसूस किया था. सूडान के दक्षिणी व्हाइट नाइल राज्य में, अब बारिश का मौसम देर से शुरू होने लगा है और वर्षा कम होती जा रही है.

लम्बे, कठोर शुष्क मौसम के दौरान, उनके बच्चों को पानी इकट्ठा करने के लिए, प्रति दिन तीन घंटे की यात्रा करनी पड़ती थी, जिसकी वजह से उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा था. पानी की बग्घी को खींच कर ले जाना वाला पालतू गधा भी धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा था.

नीमा एलमसाद ने बताया, “जब गधा मर गया, तो हमें बहुत नुक़सान हुआ. मुझे भोजन पकाने और पीने के लिए पड़ोसियों से पानी माँगना पड़ता था. हम सप्ताह में केवल एक बार ही नहा पाते थे.”

सूडान के उम नाम उम गाँव की किसान नीमा एलमसाद का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने उनके खेतों को तबाह कर दिया है.

सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी किनारे पर फैले सूडान की जलवायु, उत्तर में रेगिस्तान और अर्द्ध -रेगिस्तान से लेकर, देश के दूसरी ओर स्थित शुष्क सवाना तक बहुत अलग है.

हाल के दशकों में, जनसंख्या वृद्धि और कृषि विकास से पानी की ख़पत में वृद्धि के साथ-साथ संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंधों और राजनैतिक अस्थिरता के प्रभावों के मद्दनेनज़र, सहायता संगठनों ने आसन्न जल संकट की चेतावनी दी है.

जलवायु परिवर्तन, जिसे अक्सर ‘ख़तरे के गुणक’ के रूप में वर्णित किया जाता है, इस जोखिम में इज़ाफ़ा कर रहा है. वर्षा अधिक अनियमित हो गई है, जबकि बाढ़ और सूखा अधिक पड़ने लगे हैं.

बढ़ते तापमान का मतलब है कि जो थोड़ी वर्षा होती भी है, वह जल भी अधिक तेज़ी से भाप बनकर उड़ जाता है, जिससे मिट्टी की नमी भी कम हो जाती है. इससे लगभग दो-तिहाई ग्रामीण सूडानियों के लिए कृषि अधिक नुक़सानदेह बन जाती है, ख़ासतौर पर बारिश पर निर्भर एलमसाद जैसे छोटे किसानों और पशुपालकों के लिए.

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सूडान में तापमान ख़तरनाक रूप से बढ़ना जारी रहेगा, और यदि वर्षा का मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो सहारा रेगिस्तान प्रति वर्ष 1.5 किमी की दर से दक्षिण की ओर बढ़ता रहेगा व  कृषि और चरागाह भूमि को निगल जाएगा.

छह साल पहले अपने पति की मृत्यु के बाद अकेले ही घरवालों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी सम्भालने वाली एलमसाद के लिए यह स्थिति भयावह है.

नीमा एलमसाद का 11 वर्षीय बेटा, एलनौर एल्बशीर (बाएँ), और उसका पड़ोसी, अवदल्लाह (दाएँ), उम नाम उम गाँव के बाहरी इलाक़े के एक पुनर्वासित जलाशय से पानी इकट्ठा कर रहे हैं.

सूडान के अनेक अन्य किसानों की तरह, एलमसाद के पास जलवायु झटकों के अनुकूलन के लिए आय और विशेषज्ञता का अभाव है.

उसके खेत के लिए, देर से होने वाली और छिटपुट बारिश का मतलब है कि उनकी फ़सलों को पकने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा, जिससे वो कमज़ोर एवं कीटों के प्रति सम्वेदनशील हो जाएँगी. उनका अनुमान है कि पिछले एक दशक में उनकी फ़सल आधी रह गई है.

अपनी ज़रूरतें पूरा करने के लिए, एलमसाद को अगली फ़सल के लिए अपनी ज़मीन तैयार करने के बजाय, दूसरे खेतों पर काम करना होगा, जिससे वो ग़रीबी के दुष्चक्र में फँसती जाएँगी.

उन्होंने बताया, “जब पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो हम उम्मीद खो देते हैं कि हमारी फ़सलें बढ़ेंगी.कभी-कभी तो खाने के लिए कुछ भी नहीं होता.”

महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन का अत्यधिक बोझ पड़ता है, विशेष रूप से सूडान में, जहाँ वे काफी हद तक घरेलू खाद्य सुरक्षा और बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी सम्भालती हैं.हालाँकि निर्णयों में उनकी भागेदारी सीमित होती है.

जलवायु अनुकूलन तकनीकों का प्रशिक्षण

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) के नेतृत्व में और पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के लिए सूडान की उच्च परिषद द्वारा लागू की गई एक परियोजना, व्हाइट नील राज्य में 43 समुदायों को महिलाओं और प्रकृति-आधारित समाधानों पर विशेष ध्यान देने के साथ जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनसक्षमता निर्माण में मदद कर रही है.

यह परियोजना, वैश्विक पर्यावरण सुविधा द्वारा वित्त पोषित है, जोकि जलवायु परिवर्तन परियोजनाओं का एक प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय समर्थक है.

इसके तहत, 2018 में, एलमसाद के गाँव में एक विकास समिति की स्थापना की गई, जिसके लिए यह आवश्यक था कि उसके बोर्ड में 30 प्रतिशत महिलाएँ हों.

समिति ने इस बात की जाँच की कि जलवायु परिवर्तन, समुदाय को किस तरह से प्रभावित कर रहा है और ग्रामीणों के अनुकूलन में मदद करने के लिए सूखा-प्रतिरोधी खेती के उपाय व पानी तक बेहतर पहुँच जैसे तौर-तरीक़ों की पहचान की.

एलमसाद के लिए, यह परियोजना परिवर्तनकारी रही है. इसके तहत, वर्षा के मौसम में पानी को रोकने और उसे साल भर संग्रहित करने के लिए, एक 30 हज़ार क्यूबिक मीटर जल संचयन जलाशय का निर्माण किया गया था.

अब उस जलाशय में, एलमसाद के सबसे छोटे बेटे, एल्नौर, एक बड़े नीले प्लास्टिक के ड्रम में साफ़ पानी भरते हैं. यह स्थान उनके घर से केवल 20 मिनट की दूरी पर है, जिसका अर्थ यह है कि उनके पास स्कूल जाने के लिए अभी पर्याप्त समय व ऊर्जा बचती है.

चरवाहे हसन मुहम्मद मूसा मुअल्ला, सूडान के उम ज़ुरिबा गाँव में पुनर्वासित चरागाह पर पशुओं को चरा रहे हैं.

व्हाइट नील राज्य में 280 से अधिक महिलाओं के साथ एलमसाद ने, परियोजना द्वारा दिए किए गए मूंगफली और तिल जैसे विशेष सूखा प्रतिरोधी, उच्च उपज वाले बीज भी लगाए हैं. महिलाओं ने उन्हें अलग करने, कीटनाशक छिड़कने व मोल्ड एवं कीटों से बचाने के फ़सल का उचित भंडारण उपाय सीखे हैं.

समुदाय के लोगों ने फलदार वृक्ष भी लगाए हैं, जिनसे भोजन और छाया दोनों प्राप्त होती है. शोध बताता है कि धूप भरे दिन में, एक इक़लौते स्वस्थ पेड़ में उतनी ही शीतलन शक्ति हो सकती है जितनी दो घरेलू एयर कंडीशनर 24 घंटे चलने पर ठंडक प्रदान करते हैं.

परियोजना का असर

इस परियोजना ने हज़ारों महिलाओं को विविध प्रकार की जलवायु अनुकूलन तकनीकों को चुनने में मदद के ज़रिये सशक्त बनाया है, जिनमें एक हज़ार से अधिक वो महिलाएँ हैं, जिन्हें कठिन जलवायु परिस्थितियों में सब्जियाँ उगाने का प्रशिक्षण दिया गया है.

प्रकृति-आधारित समाधानों का उपयोग करके, इस परियोजना ने देशी प्रजातियों का उपयोग करके लगभग चार हज़ार हैक्टेयर वनों और चारागाह भूमियों को बहाल करने में मदद की है. कुल मिलाकर, व्हाइट नील राज्य में अब आठ हज़ार से अधिक घरों की, जलवायु-प्रतिरोधी भोजन और जल स्रोतों तक पहुँच है.

यह उम्मीद व्यक्त की गई है कि समय के साथ, देश भर में अधिक किसानों तक पहुँचने के लिए, परियोजना का विस्तार किया जा सकेगा. इसकी सफलता के संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि छोटे किसान अब फ़सलों की उन्नत किस्में उगाकर, समुदाय के अन्य लोगों को बीजों का वितरण करने लगे हें.

उम नाम उम गाँव की निवासी नीमा एलमसाद, अपने घर में अनाज की थाली लिए हुए. सूखा-प्रतिरोधी फ़सलें लगाने के बाद से उनकी फ़सल व आय में वृद्धि हुई है, जिससे अब वह अपने परिवार के लिए अधिक भोजन ख़रीद सकती है.

यूनेप की जलवायु परिवर्तन अनुकूलन इकाई प्रमुख, जेसिका ट्रोनी बताती हैं, “हमारा उद्देश्य इन अनुकूलन तकनीकों को व्हाइट नील राज्य के अन्य समुदायों तक पहुँचाना है, और एक दीर्घकालिक लक्ष्य यह है कि किसानों की जलवायु सहनसक्षमता निर्माण के लिए इन दृष्टिकोणों को स्थानीय अनुकूलन नीतियों में शामिल किया जाए.”

यूनेप, वर्तमान में दुनिया भर के 70 देशों को ज़मीनी स्तर की परियोजनाओं, नीति समर्थन और उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान, जैसे अनुकूलन गैप रिपोर्ट के ज़रिए, जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु अनुकूलन उपायों में एक हज़ार 700 अरब डॉलर का निवेश करने से, अनेक लोगों की जीवन रक्षा के साथ-साथ, आर्थिक रिटर्न में सात हज़ार अरब डॉलर से अधिक का मुनाफ़ा होगा.

इसलिए, निम्न और मध्यम आय वाले देशों ने नवम्बर 2022 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में जलवायु अनुकूलन के लिए उच्च वित्त पोषण प्रतिबद्धताओं पर ज़ोर दिया था.

सम्मेलन में वार्ताकारों ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार किया कि जलवायु विनाश से होने वाले नुक़सान के लिए किसे भुगतान करना चाहिए, विशेष रूप से सूडान जैसे ग़रीब देशों को ध्यान में रखते हुए, जो ऐतिहासिक रूप से अपेक्षाकृत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के ज़िम्मेदार हैं.

बेहतर भविष्य

एलमसाद के लिए, जलवायु अनुकूलन के आर्थिक लाभ स्पष्ट हैं. मूँगफली और तिल की अधिक उपज होने पर, फ़सल का कुछ हिस्सा बेचकर वो, कपड़े, भोजन और अपने परिवार के लिए बेहतर शिक्षा हासिल कर पाती हैं.

अपने घर पर नए लगाए पेड़ों की छाँव में बैठे हुए उन्होंने बताया, “इससे पहले कि मैं पारम्परिक किस्में उगाती थी और लगभग एक या दो बोरी जमा कर पाती थी. अब मैं पाँच बोरी जमा करती हूँ. इससे हम सभी का जीवन बेहतर हुआ है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.



From संयुक्त राष्ट्र समाचार

Anshu Sharma

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