भारत की सबसे पवित्र नदी की पुनर्बहाली के प्रयास


नुकीले दाँतों वाली एक लम्बी थुथनी, पानी के ऊपर उभरती है, धीरे-धीरे उसका पंख और विशालकाय पीठ दिखाई देने लगती है. फिर वह अचानक ग़ायब हो जाती है.

उत्तरी भारत में गंगा नदी में डॉल्फ़िन दिखना आसान नहीं है. मैले पानी में वे आसानी से छुप जाती हैं और नावों के आसपास आने से बचती हैं. लेकिन उनकी दुर्लभता का ज़्यादा बड़ा कारण, उनके निवास स्थान का क्षरण है.

मगर, संरक्षणवादियों का कहना है कि गंगा नदी की बहाली के एक ठोस प्रयास की बदौलत, अब, लुप्तप्राय डॉल्फ़िन और अन्य वन्यजीव दोबारा नज़र आने लगे हैं.

‘नमामि गंगे’ परियोजना

गंगा, भारत की सबसे पवित्र नदी, 50 करोड़ से अधिक लोगों के लिए आर्थिक जीवन रेखा है और अनगिनत प्रजातियों का निवास स्थल है.

नौ वर्षों से, गंगा किनारे बसे शहरों ने नदी में प्रदूषण का प्रवाह रोकने और जलमार्ग व उसकी सहायक नदियों के भूदृश्य को संवारने के लिए प्रयास किए हैं.

‘नमामि गंगे’ नामक इस पहल की शुरुआती सफलताओं के आधार पर इसे विश्व में पुनर्बहाली के उत्कृष्ट उदाहरणों में चुना गया है. 

पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक के तहत सम्मानित, इस पहल की सराहना के ज़रिये, प्राकृतिक दुनिया को पुनर्जीवित करने के उन महत्वाकांक्षी प्रयासों को पहचान मिली है, जिनके ज़रिये जलवायु परिवर्तन, प्रकृति एवं जैवविविधता हानि, और प्रदूषण व कचरे के तिहरे संकट का सामना किया जा रहा है.

2014 में, भारत सरकार ने एक कार्य योजना का अनावरण किया जिसमें गंगा को साफ़ करने के लिए 4 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) की समुद्री और ताज़ा पानी शाखा की प्रमुख लेटिशिया कार्वाल्हो ने कहा, “गंगा को बहाल करने से उन प्राकृतिक प्रणालियों और मानव समाजों की रक्षा होगी जिन्हें सदियों से नदी द्वारा पोषित किया जाता रहा है.”

“सभी नदियों की कद्र व देखभाल करने से, महासागरों व समुद्रों के साथ उनके सम्बन्ध, हमारे ग्रह के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ, लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण होंगे.”

गंगा, हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक, ढाई हज़ार किलोमीटर का सफ़र तय करती है. इसका बेसिन भारत के एक चौथाई हिस्से पर फैला है और भारत की आबादी, 1.4 अरब लोगों में से 40 प्रतिशत से अधिक लोग इसके आसपास रहते हैं.

राष्ट्रीय ताज़ा पानी संसाधनों में इसका हिस्सा एक चौथाई से अधिक है, और देश का लगभग 40 प्रतिशत आर्थिक उत्पादन यहीं होता है.

लेकिन भारत की तीव्र आर्थिक प्रगति और बढ़ती जनसंख्या ने नदी और उसकी सहायक नदियों पर भारी प्रभाव डाला है. शहरीकरण, औद्योगीकरण और सिंचाई के लिए पानी की ख़पत बढ़ने के कारण, नदी के जल पर असर डाला है व तटीय भूमि का क्षरण हुआ है.

‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम को लागू करने वाले राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक, जी अशोक कुमार ने बताया, “पिछले 20-25 वर्षों में हमने पाया है कि पानी की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है. तब ही ख़तरे की घंटी बज उठी.”

जल प्रदूषण की रोकथाम

2014 में, भारत सरकार ने गंगा को स्वच्छ करने के लिए इस कार्य योजना को शुरू किया, जिसमें चार अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया गया है.

इसमें से अधिकतर धनराशि, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट को अनुपचारित नदी में गिरने से रोकने के लिए ख़र्च की जा रही है. नए शोधन संयंत्र, हर दिन पाँच अरब लीटर अपशिष्ट जल स्वच्छ करने की क्षमता रखते हैं.

इस कार्य योजना का एक लक्ष्य हरिद्वार, कानपुर और वाराणसी जैसे प्रमुख शहरों में जल की गुणवत्ता में सुधार करना है, जिसमें नदी के किनारे स्थित मंदिर भी शामिल हैं, जहाँ लाखों लोग गंगा में डुबकी लगाकर अच्छे भाग्य व पापों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं, मृतकों का अंतिम संस्कार या फिर उनकी अस्थियाँ जल में विसर्जित करते हैं.

इसके अलावा, जलमार्गों के किनारे उन देशी पेड़ों को लगाने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है, जो प्रदूषकों और तलछट को नदी में प्रवेश करने से रोकने में मदद करते हैं और लाखों टन जलवायु-हानिकारक कार्बन को संग्रहीत करते हैं.

सरकार के अनुसार, अब तक गंगा तट की लगभग 30 हज़ार हैक्टेयर भूमि पर जंगल बहाल किए जा चुके हैं. वर्ष 2030 तक, इसे  आँकड़े को एक लाख 35 हज़ार हैक्टेयर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है.

संरक्षणवादी, गौरा चंद्र दास का कहना है कि गंगा तट पर वन्यजीव लौटने लगे हैं.

टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन

नदी में जल प्रदूषण में कमी लाने और ज़रूरत से अधिक जल के इस्तेमाल को रोकने के लिए, सरकार टिकाऊ खेती को बढ़ावा दे रही है.

किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर गाय के गोबर और पौधों के अर्क से बने विकल्पों या फ़सलों की कवर जुताई जैसे प्राकृतिक विकल्पों का इस्तेमाल करें. इस तकनीक से, मिट्टी की नमी बनाए रखने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है.

स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक ने बताया कि किसानों की पैदावार गिरने का डर निराधार साबित हुआ. “प्रकृति से उन्हें मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने, इसे फिर से जीवन्त करने, अधिक जैविक बनाने और पानी की ख़पत कम करने में मदद मिल रही है.”

समुदायों की भागेदारी

भारत में गंगा नदी को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है.

इस पहल की एक अन्य शाखा, सार्वजनिक जागरूकता में सुधार लाने के प्रयास करने में लगी है. पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण व बहाली में सैकड़ों संगठनों एवं समुदायों को शामिल किया गया है. इसमें मछुआरे भी शामिल हैं, जो डॉल्फ़िनों की ही तरह, नदी की सेहत पर निर्भर हैं.

माना जाता है कि डॉल्फ़िन, जिनकी संख्या कुछ हज़ार है, गंगा बेसिन में पाए जाने वाले पौधों और जानवरों की अनुमानित 25 हज़ार प्रजातियों में से एक हैं, जिनमें अन्य 143 जलीय जानवर भी शामिल हैं.

संरक्षण के लिए, अन्य प्रमुख प्रजातियों में सॉफ्टशेल कछुए और ऊदबिलाव शामिल हैं. बताया गया है कि कि एक बेशक़ीमती मछली, हिल्सा शाद भी नदी के कई हिस्सों में वापस आ गई है.

जी. अशोक कुमार को उम्मीद है कि भारत और उसके बाहर भी इसी तरह के प्रयासों से नदियों का संरक्षण सम्भव हो पाएगा.

“नमामि गंगे परियोजना हमें यह सबसे बड़ी सीख देती है कि कुछ भी असम्भव नहीं है. यह अगली पीढ़ी के लिए एक ज़बरदस्त उम्मीद होगी, क्योंकि पानी एक बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन बनने जा रहा है.”

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.



From संयुक्त राष्ट्र समाचार

Anshu Sharma

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